ननिहाल में विराजे गणपति, दक्षेश्वर महादेव मंदिर में विधिवत हुई प्रतिमा स्थापना

विघ्नहर्ता भगवान गणेश प्रथम पूज्य, उनकी आराधना से शुभ कार्यों का होता है मंगलारंभ: रविंद्र पुरी

हरिद्वार। तीर्थनगरी हरिद्वार में गणेश चतुर्थी महोत्सव का उल्लास छा गया है। कनखल स्थित भगवान शिव की ससुराल के रूप में प्रसिद्ध दक्षेश्वर महादेव मंदिर प्रांगण में सोमवार को विधिवत पूजा-अर्चना के साथ भगवान गजानन की प्रतिमा स्थापित की गई। इसी के साथ दस दिवसीय गणेश चतुर्थी महोत्सव का शुभारंभ हुआ। गणपति की प्रतिमा स्थापना के दौरान श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त किया।

इस अवसर पर श्री अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद रजि. के अध्यक्ष एवं श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के श्रीमहंत सचिव रविंद्र पुरी महाराज ने कहा कि भगवान गणेश प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता हैं। सनातन परंपरा में किसी भी शुभ कार्य का आरंभ भगवान गणेश की पूजा के साथ किया जाता है। उन्होंने कहा कि भगवान गणेश बुद्धि, विवेक, समृद्धि और शुभता के प्रतीक हैं। गणेशोत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज को अपनी संस्कृति और सनातन परंपराओं से जोड़ने का भी माध्यम है।

रविंद्र पुरी महाराज ने कहा कि कनखल भगवान शिव और माता सती की पावन स्मृतियों से जुड़ी धार्मिक नगरी है। दक्षेश्वर महादेव मंदिर में गणपति का विराजमान होना श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। उन्होंने गणेशोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं से श्रद्धा और भक्ति के साथ पर्व मनाने तथा पर्यावरण संरक्षण का भी ध्यान रखने का आह्वान किया। गणेश चतुर्थी के पहले दिन तीर्थनगरी के विभिन्न क्षेत्रों में भी श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखने को मिला। कई स्थानों पर गणपति की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की गईं और विधिवत पूजा-अर्चना के साथ गणेशोत्सव की शुरुआत हुई। वहीं बड़ी संख्या में लोगों ने अपने घरों में भी भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना की।

गणेशोत्सव को लेकर बाजारों और पूजा स्थलों पर भी चहल-पहल बढ़ गई है। जगह-जगह गणपति बप्पा के जयकारे गूंज रहे हैं। आगामी दस दिनों तक विभिन्न स्थानों पर पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। अनंत चतुर्दशी के अवसर पर विधि-विधान से गणपति विसर्जन के साथ महोत्सव का समापन होगा। मूर्ति स्थापना का कार्य आचार्य अवधेश शर्मा जी के आचार्यत्व में हुआ। इस अवसर पर बड़ा उदासीन अखाड़े के कोठारी राघवेन्द्र दास महाराज, नया उदासीन अखाड़े के कोठारी नितिन दास आदि मौजूद रहे।

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